आज से ठीक 11 बरस पहले , जब ऋतूराज वसंत ने अपना जिम्मा ग्रीष्म ऋतू
को सौपने की तयारी कर ली थी, उसे नहीं पता था वो अपने पीछे एक ऐसा काला
अध्याय लिख कर जा रहा है जिसे देश की जनता आने वाले कई बरसो तक नहीं
भूलेगी। गुजरात के दंगों ने देश की अखंडता पर जो तमाचा जड़ा था,उसके निशाँ
अभी भी बरकरार है। जिस धर्म के नाम पर ये रक्त तांडव मचा था, वो आज भी
निर्भीक हो कर देश के चप्पे चप्पे पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है। पर
इंसान आज भी इस धर्म का सही अर्थ नहीं समझ पाया है. आज भी हर आदमी के जेहन
में ये सवाल कायम है, धर्म क्या है?
धर्म यह भी है,
धर्म वह भी है,
धर्म वह भी था
जो कर मटमैला बेरंग आँसुओं को
औ' सुर्ख लहू से कर दोस्ती
बेजान पड़ी इस मिट्टी की
रक्त पिपासा शांत कर गया.
वो मिट्टी, बनेंगे जिससे मंदिर-मस्जिद
औ' सजेगी धर्म की महफ़िल जहाँ,
मानवता का गुणगान करती
बजेगी धर्म की शहनाई वहाँ
उसी प्रांगण से
चार कदम की दूरी पर
जो गूँजता सन्नाटा रहेगा
धर्म वहाँ भी रहेगा !
धर्म यह भी है,
धर्म वह भी है,
धर्म वह भी था
जो मुस्कुराता था
राजू के गीता पुराण में
जो खिलखिलाता था
रज़िया के अज़ान में,
उनकी नन्ही निर्दोष मुठ्ठियों से
वो निकल पड़ा नंगे पाँव
ज़मीर की उजली चादर को
हैवानियत के काले रंग से रंगने
शमशान की बुझी आग में
औ' कब्रस्तान के सूने राग में
जब मेरा राम,तेरा अल्लाह हँसेगा
धर्म वहाँ भी रहेगा!
धर्म यह भी है,
धर्म वह भी है...
धर्म यह भी है,
धर्म वह भी है,
धर्म वह भी था
जो कर मटमैला बेरंग आँसुओं को
औ' सुर्ख लहू से कर दोस्ती
बेजान पड़ी इस मिट्टी की
रक्त पिपासा शांत कर गया.
वो मिट्टी, बनेंगे जिससे मंदिर-मस्जिद
औ' सजेगी धर्म की महफ़िल जहाँ,
मानवता का गुणगान करती
बजेगी धर्म की शहनाई वहाँ
उसी प्रांगण से
चार कदम की दूरी पर
जो गूँजता सन्नाटा रहेगा
धर्म वहाँ भी रहेगा !
धर्म यह भी है,
धर्म वह भी है,
धर्म वह भी था
जो मुस्कुराता था
राजू के गीता पुराण में
जो खिलखिलाता था
रज़िया के अज़ान में,
उनकी नन्ही निर्दोष मुठ्ठियों से
वो निकल पड़ा नंगे पाँव
ज़मीर की उजली चादर को
हैवानियत के काले रंग से रंगने
शमशान की बुझी आग में
औ' कब्रस्तान के सूने राग में
जब मेरा राम,तेरा अल्लाह हँसेगा
धर्म वहाँ भी रहेगा!
धर्म यह भी है,
धर्म वह भी है...

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